श्री अलबेलिशरण दास बाबाजी
श्री निम्बार्क सम्प्रदाय के मूल आचार्य श्रीहंस भगवान और श्री सनकदिक् भगवान कार्तिक शुक्ल नवमी सत्युग , श्री नारद भगवान मार्गशीर्ष शुक्ल द्वादशी सत्युग, श्री निम्बार्क भगवान कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा द्वापरान्त, इनके पश्चात बारह आचार्य हुए। बारहवें आचार्य श्री देवाचार्य से दो परम्परा चली।
एक श्री ब्रजभूषण देवाचार्य , दूसरी सुन्दर भट्ट देवाचार्य। श्री ब्रजभूषण देवाचार्य की परम्परा में बासठवें 62 आचार्य श्री स्वामी आशुधीर देवाचार्य हुए। उन्हीं के शिष्य रसिक अन्य नृपति श्री स्वामी हरिदास जी महाराज तिरसठवें 63 आचार्य हुए। इन्हीं श्री स्वामी हरिदास महाराज की शिष्य परम्परा में छठे आचार्य श्री रसिक देव महाराज आचार्य हुए। इन से तीन परम्परा प्रारम्भ हुईं। श्री रसिक बिहारी जी परम्परा, श्री गोरेलाल जी की कुन्ज परम्परा, श्री टटिया स्थान की परम्परा में सातवें आचार्य श्री स्वामी ललितकिशोरी देव जी महाराज । इसी परम्परा मे ग्यारहवे आचार्य श्री राधाचरण दास जी महाराज हुए। उन्हीं के कृपा पात्र/ शिष्य/ पूज्य रासिक सन्त सदगुरू देव बाबा श्री अलबेलीशरण जी महाराज हैं।
अनन्यता माने लोक - वेद की रीति को त्यागकर एकमात्र प्रभु की भक्ति करना ।अर्थात् ज्ञान, योग, जप, तप, तीर्थ सेवन,यज्ञ, देव पूजन आदि लोक-वेद के धर्मों का बल छोड़कर सब रूप में अपने इष्ट को देखते हुए मन से , वचन से, क्रिया से अपने इष्ट का अनन्य भाव से भजन करना।श्री बिहारी-बिहारिनी ही मेरे इष्ट है। वे मेरे माता, पिता, पति, पुत्र, भाई, मित्र आदि सर्वस्व है। वे मेरे ही है और मैं उनकी, उनका हूँ। एक मात्र उन्हीं को भजूँगा, उन्हें एक क्षण के लिये भी नही छोडूँगा। यह अनन्य भजन का स्वरूप है।सभी इष्ट , आचार्य, गुरु, सन्त, पूज्य हैं, वन्दनीय, प्रणाम करने योग्य हैं, पर भजन, सेवन, संग अपने इष्ट, आचार्य, गुरु, सन्त का ही करना चाहिये। तभी प्रेम रस की प्राप्ति होती है[ निकुंज रस माने दिव्य आनन्द।प्रिया- प्रियतम श्री कुञ्जबिहारिनी- कुञ्जबिहारी रस रूप ही हैं। वे परब्रह्म हैं, रसब्रह्म हैं। वे परम अति महान प्रेम के रूप हैं। वे परस्पर एक दूसरे को सुख देने के लिये ही बिहार-विलास, खेल- लीला करते हैं। दोनों प्रिया-प्रियतम का बिहार उनके भक्तजनों- सखीजनों के लिये ही है।उनको सुख देने के लिये। सखीजन उनके प्रेम का, उनकी इच्छा का स्वरूप ही हैं। सखीजनो का सुख भी प्रिया- प्रियतम का सुख ही है। वे सखीजन प्रिया-प्रियतम का सुख ही हैं। वे सखीजन प्रिया -लाल को बिहार करते हुए सुख मे मग्न देखती हैं, तो अति प्रसन्न होती हैं, मानो उनको अपना प्राण, जीवन मिल गया है।
जीव श्री बिहारीजी का अंश है। श्री बिहारीजी प्रेमसिन्धु है तो जीव बिन्दु है। पर उन्हीं के गुणों से गुणवान है। श्री बिहारीजी के प्रेम रसमय गुण उसमे विद्यमान हैं। शरीर-संसार रूप माया के संग से माया- मोह में पड जाने, लिप्त हो जाने से वे गुण छिप गये है। उनके सन्मुख होते ही , उनकी सच्ची भक्ति करने से वे गुण प्रकट होते हैं, जो बिहारी से मिलाने वाले, सेवा में पहुँचानेवाले होते हैं।
इसलिये भक्त को न संसार के सुखों की, न स्वर्ग के , न योग के, न ब्रह्मलोक के सुखों की ओर, न मुक्ति के सुखो की इच्छा करनी चाहिये। उसे तो एकमात्र श्री श्यामा श्याम के चरणों की सेवा की ही इच्छा करना चाहिये। उनका दर्शन मिले, उनकी सेवा मिले, यही सब से बड़ा लाभ है।भगवदीय मंगलमय विधान अति विचित्र है। वह करुणा, स्नेह, प्रेम, आत्मीयता से भरपूर होता है।परम करुणा सागर, परम सुहृद श्री हरि का आत्मीय स्नेह से परिपूर्ण कल्याणमय विधान जीव का हित करता हुआ सदा उसके साथ रहता है तथा एक दिन उसका स्नेह रस से परिप्लुत कल्याण करके ही तृप्त होता है, सन्तुष्ट होता है। पूज्यवर रसिक संत सदगुरुदेव बाबा श्री अलबेलीशरण जी महाराज भी महापुरुष है। जिनका जन्म भक्तों के घर मे हुआ, जहाॅ कीर्तन भजन भाव रूप सम्पत्ति विरासत रूप में उन्हें सहज प्राप्त होती गयी और वे साधन सिद्ध रूप लक्ष्य की ओर उत्तरोत्तर बढ़ते गये। उनका जन्म यदुवंशीय क्षत्रीय ठाकुर समाज में हुआ। श्री कृष्ण इस समाज के पूर्व पुरुष है। उनका जन्म चोली गाॅव में नर्मदा तट पर म .प्र. में ननिहाल में गोधूली बेला में हरियाली श्रावणी अमावस्या बुधवार सम्वत् 1995 विक्रम तदनुसार 27 जुलाई सन 1938 में हूआ।17,5 की उम्र में सन 1956 में होली के दूज के दिन घर त्याग किया और वृंदावन की कुंजों व गुफा में रह कर अहर्निश भजन किया। साधना काल की स्थिती में यमुना किनारे व पेड़ों के नीचे रह कर वे निरन्तर नाम जप व स्मरण करते थे।वे पुराने ग्रन्थों का पुनः प्रकाशन कर अपने परम्परा के महनीय ग्रन्थों को साधकों के लिये, परमार्थ पथ लक्ष्य प्राप्त करने के लिये कृपा प्रसाद रूप में दे रहे हैं।निंदा स्तुति छल कपट पर दोष देखना वे नही जानते हैं।शील मृदुल संकोची दयावान परोपकारी उनका स्वभाव है।सन 1995 से वर्तमान में वे श्री गोरे लाल जी की कुंज में रह रहे है।उन्होंने अपने जन्म स्थान पर 450 वर्ष पुराने श्री राधा विनोद बिहारी जी के मंदिर का नव निर्माण सन 2015 में कर नवीन श्री स्वामी हरिदास जी व अष्टाचार्यों को विराजित किया है।सद्गुरुदेव जहाँ पैदा हुए वहां पर पहले से ही श्री ललिता जी सहित श्री प्रिया प्रियतम विराजित थे जो सखी सम्प्रदाय के अन्तर्गत है।